मेवात में हिंदुओं पर अत्याचार और जबरन धर्मांतरण का आरोप लगाने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार

हरियाणा के नूंह (मेवात )में हिंदुओं पर अत्याचार और जबरन धर्मांतरण का आरोप लगाने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने से इनकार कर दिया है, याचिका में जबरन धर्मांतरण, हिंदुओं की संपत्तियों की गैरकानूनी बिक्री और हिंदू लड़कियों पर अत्याचार की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम ( एसआइटी ) से जांच कराए जाने की मांग की गई थी। भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना, जस्टिस एएस बोपन्ना और हृषिकेश रॉय की बेंच ने याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। Atrocities on Hindus in Mewat

सुप्रीम कोर्ट के वकील विष्णु शंकर जैन की अगुवाई में 5 वकीलों ने याचिका दायर कर कहा था कि हरियाणा के मेवात से हिंदू पलायन कर रहे हैं,उनका धर्म परिवर्तन करवाया जा रहा है। अपनी बात को मजबूती देते हुए जैन ने कहा, 431 में से 103 गांवों में एक भी हिंदू नहीं बचा है। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को गंभीरता से नहीं लिया और सुनवाई करने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनवाई से इनकार किये जानें के बाद वकील विष्णु जैन ने कहा, केवल आंदोलन ही न्याय दिला सकता है? इस धर्मनिरपेक्ष संस्थागत तंत्र में हिंदुओं को न्याय नहीं मिल सकता है। Atrocities on Hindus in Mewat


“याचिका में कहा गया था कि ‘कई हिंदुओं को जबरन इस्लाम में परिवर्तित किया गया है और कई हिंदू महिलाओं और नाबालिग लड़कियों का अपहरण और बलात्कार किया गया है। हिंदू महिलाएं बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं हैं। बड़ी संख्या में मुसलमानों ने अनुसूचित जाति के लोगों पर अत्याचार किया है. Atrocities on Hindus in Mewat

इस याचिका में एसआईटी से जांच कराये जानें की मांग की गई थी जिसमें केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के सदस्य शामिल हों, जिसकी निगरानी सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जज करें, ताकि जबरन धर्मांतरण, व् अन्य पहलुओं को को देखा जा सके। याचिका में कहा गया है कि स्थानीय पुलिस कानून द्वारा निहित शक्तियों का प्रयोग करने में विफल रही है, जिससे प्रत्येक हिंदू का जीवन और स्वतंत्रता खतरे में है।

बार एन्ड बेंच के मुताबिक़, याचिका में यह भी कहा गया है कि तब्लीगी जमात के संरक्षण में मुसलमानों ने धीरे-धीरे अपनी ताकत बढ़ाई है “और अब स्थिति यह है कि हिंदुओं की आबादी घट रही है और पिछली जनगणना 2011 के बाद से यह 20% से घटकर 10-11% हो गई है।”