लाशों के बहाने योगी सरकार को बदनाम कर रहे एजेण्डाधारी हुए एक्सपोज, अरसे से है गंगा किनारे शव दफन की परम्परा

अलग-अलग अवतारों में छुपे कुछ गिद्ध टाइप के लोग कोरोना काल में लाशों के बहानें पिछले कई दिनों से उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को बदनाम कर रहे हैं, लेकिन अब इनकी पोल खुल गई है और असलियत सामने आ गई है, जी हाँ! दरअसल एजेन्डाधारियों का कहना है कि कोरोना काल में यूपी में शमशान खाली नहीं हैं, इसलिए लोग गंगा किनारे शव दफ़न कर रहे हैं, दैनिक जागरण की पड़ताल में सामने आया है कि गंगा किनारे शव दफन करना कोई नई बात नहीं है, ये परम्परा अरसे से चली आ रही है, अपनी बात को मजबूती देने के लिए दैनिक जागरण ने गंगा किनारे दफ़न किये शवों की तीन साल पुरानी एक तस्वीर सामने रखी है, तब कोरोना का नामोनिशान नहीं था, तीन साल पुरानी और अब की तस्वीर में कोई फर्क नहीं है, नीचे देख सकते हैं।

दरअसल कुम्भ 2019 में जब तीर्थराज प्रयाग के श्रृंगवेरपुर का कायाकल्प हो रहा था, उसी समय 18 मार्च 2018 को दैनिक जागरण के फोटो जर्नलिस्ट मुकेश कनौजिया ने संगमनगरी में गंगा किनारे दफन किये गए शवों की तस्वीर अपने कैमरे में कैद की थी, इस तस्वीर और हालिया तस्वीर में कोई फर्क नहीं है, तीन साल पहले न कोरोना जैसी आपदा थी और न ही शवों को दफन करने की कोई मज़बूरी, बस थी तो एक परम्परा जो कई हिन्दू परिवारों में पुरखों से चली आ रही है. एक ऐसी परम्परा जो बहुत पुरानी है लेकिन गंगा की निर्मलता के हिसाब से उचित नहीं है.

दैनिक जागरण में छपी खबर के मुताबिक, प्रयागराज के श्रृंगवेरपुर और फाफामऊ घाट पर अरसे से शव दफ़नाने की परम्परा रही है, अब के हालात को समझने के लिए दैनिक जागरण प्रयागराज के सम्पादकीय प्रभारी राकेश पांडेय समेत इस मीडिया समूह में कार्यरत कई पत्रकारों ने श्रृंगवेरपुर सहित गंगा किनारे के लगभग एक दर्जन गाँवों का दौरा किया। 70 किलोमीटर से अधिक यात्रा में पत्रकारों की टीम ने अंतिम संस्कार के लिए शव लेकर आये लोगों व् गाँव के बुजुर्गों से लेकर घाट के पंडा समाज से बात की, अंत में निष्कर्ष यही निकला कि गंगा किनारे शव दफन की परम्परा अरसे से चली आ रही है, लेकिन अब इंटरनेट पर जानबूझकर तस्वीरों के जरिये हो-हल्ला मचाया जा रहा है.