आंदोलन तो बहाना है, असली मकसद जेल में सड़ रहे दंगाइयों को छुड़ाना है, ये रहा सबसे बड़ा सबूत

पिछले लगभग 11 दिनों से दिल्ली में कृषि कानून के विरोध में पंजाब के किसान आंदोलन कर रहे हैं, इस आंदोलन में राजनैतिक लोगों की भी इंट्री हो चुकी है, इसी आंदोलन में खालिस्तानी आतंकवादी भिंडरावाले की तस्वीर दिखी, इसी आंदोलन में एक तथाकथित किसान ने खुलेआम कहा, इंदिरा को ठोंक दिया, मोदी को भी..? इसी आंदोलन में पूर्व भारतीय क्रिकेटर युवराज सिंह के पिता योगराज सिंह ने हिन्दुओं के खिलाफ जहर उगलते हुए उन्हें गद्दार बताया। इन्हीं सब बयानों को देखते हुए सोशल मीडिया पर आशंका जताई जाने लगी कहीं ये किसान आंदोलन हाईजैक तो नहीं हो गया, जी हाँ! अब ये शंका सच में तब्दील हो रही है.

दरअसल किसान जिस कृषि कानून के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं और रद्द करने की मांग कर रहे हैं इसी को लेकर किसान संगठन के प्रतिनिधियों और सरकार के बीच 5 राउंड की बातचीत हो चुकी है लेकिन अभी तक कोई हल नहीं निकला है, अब छठे राउंड की बातचीत 9 दिसंबर को होगी, उससे पहले किसानों ने 8 दिसंबर, 2020 को भारत बंद बुलाया है, किसानों द्वारा बुलाये गए भारत बंद को कांग्रेस, सपा और आम आदमी पार्टी समेत कई पार्टियां समर्थन दे रही हैं.

सरकार का मानना है कि बात अगर किसानों की होती है तो कब का मामला सुलझ चुका होता। यहां खेल कुछ और ही चल रहा है। किसानों के नाम पर कुछ मांग रखी गयी हैं, ये मांगे ऐसी हैं जो किसान आंदोलन से तो बिल्कुल मेल नहीं खाती हैं.

मांग ये रखी गई है कि तीनों कृषि कानूनों को निरस्त किया जाय, देश भर में सभी बुद्धिजीवियों, लेखको, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं आदि पर दर्ज सारे मामले वापस लिए जाएं। उन्हें तुरंत जेल से रिहा किया जाए।

अब आप खुद सोंचिये किसान आंदोलन से बुद्धिजीवियों, लेखको का क्या मतलब, ये आंदोलन कृषि कानून के विरोध में हो रहा है या जो जेल में बंद है उन्हें छुड़ाने के लिए. बताते चलें कि नागरिकता संसोधन कानून ( CAA ) प्रोटेस्ट के दौरान दंगा हुआ था, बड़े पैमाने पे दंगाई गिरफ्तार हुए थे. वामपंथी जमात उन्हें में से कुछ दंगाइयों को बुद्धिजीवी मानती है. जैसा लोगों ने आशंका जताई थी, वही हुआ, किसान आंदोलन हाईजैक कर लिया और किसानों को ढ़ाल बनाकर अपना एजेंडा चलाने लगे।