भारत के इन 8 राज्‍यों में बेहद कम है हिंदू आबादी, फिर नहीं दिया जा रहा है अल्पसंख्यक का दर्जा

नई दिल्ली, 13 जून: वैसे तो भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, जिसे सेकुलर भी कहा जाता है, सभी धर्मों का सम्मान होता है, भारत में मुस्लिम समेत कई धर्मों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया है। अल्पसंख्यक का दर्जा पाने वाले को जो लाभ मिलते हैं वो लाभ या फायदा बहुसंख्यकों को नहीं मिलते हैं। आज हम आपको भारत के उन आठ राज्यों के बारें में बताएंगें जहाँ हिन्दू आबादी बेहद कम है फिर भी इन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा नहीं दिया जा रहा है। अल्पसंख्यक का दर्जा न मिलनें के कारण अल्पसंख्यकों को मिलनें वाले लाभ से वंचित रह जाते हैं।

कम हिन्दू आबादी वाले आठ राज्यों में 5 उत्तर पूर्वी राज्य मिज़ोरम, नगालैंड, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर शामिल हैं, बाक़ी तीन राज्य पंजाब, जम्मू कश्मीर और लक्षद्वीप हैं।

2011 की जनगणना के मुताबिक, 8 राज्यों में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं. इसमें लक्षद्वीप में हिंदुओं की तादाद 2.5% प्रतिशत तो मुस्लिमों की संख्‍या 97% है. मिजोरम में हिंदू सिर्फ 2.75% हैं जबकि ईसाई 90% हैं. नगालैंड में भी 90% ईसाई हैं और 8.75%. जम्मू कश्‍मीर में हिंदू आबादी 28.44% है जबकि मुस्लिम आबादी 69%. मेघालय में हिंदू 11.53% हैं जबकि ईसाई 84%., अरुणाचल प्रदेश में 29% हिन्दू जबकि 71% ईसाई हैं. मणिपुर में 31.39% हिन्दू और 68% ईसाई आबादी है, इसी तरह पंजाब में 38.40% हिन्दू और 61% सिख आबादी है। इन राज्यों में हिन्दुओं की तादाद इतनी कम होनें के बावजूद हिन्दू अल्पसंखयक वाला दर्जा नहीं पा रहे हैं।

गौरतलब है कि प्रचंड बहुमत से सत्‍ता में पहुंची मोदी सरकार ने अपनी दूसरी पारी में अल्‍पसंख्‍यकों के हितों के लिए फैसले लेने शुरू कर दिए हैं लेकिन उसके फैसलों पर सवाल भी उठने लगे हैं। सवाल ये कि आखिर सिर्फ मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध जैसे धर्म ही अल्‍पसंख्‍यकों के दायरे में क्‍यों हैं? एक साल पहले वाराणसी के साधू-संत भी इसपर सवाल उठा चुके हैं, यही नहीं! 3 साल पहले सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय ने याचिका दायर कर आठ राज्यों में हिंदुओं की जनसंख्या में गिरावट दिखाते हुए उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा देने की मांग की थी।

बता दें कि, बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद कांग्रेस की सरकार ‘अल्पसंख्यकों’ ख़ास कर मुसलमानों में पैठ बनाने के लिए एक पैकेज लेकर आई। शायद इनमें सबसे महत्वपूर्ण कदम था राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग कानून (1992) का बनाया जाना। इसमें धार्मिक समुदायों के दूसरों की अपेक्षा हाशिये पर पड़े होने के कारणों के मूल्यांकन की ज़रूरत पर बल दिया गया था. इस कानून के आधार पर मई 1993 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना हुई।

पर 1992 के इस कानून में भी ‘धार्मिक अल्पसंख्यक’ की परिभाषा नहीं दी गई है. , इस कानून के संदर्भ में समुदायों को ‘अल्पसंख्यक’ के रूप में अधिसूचित करने का अधिकार केंद्र सरकार को दिया गया है।

कानून के ज़रिए अधिकार मिलने के बाद कांग्रेस सरकार ने अक्टूबर 1993 में पांच धार्मिक समुदायों, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और पारसी को राष्ट्रीय धार्मिक अल्पसंख्यकों के रूप में अधिसूचित किया। 2014 में एक संशोधन के ज़रिए जैन समुदाय को भी राष्ट्रीय अल्पसंख्यक का दर्ज़ा दे दिया गया। लेकिन हिन्दू जहाँ कम उनके लिए अभी कोई संसोधन नहीं किया गया।