क्या मजबूरी थी मोदी की, सुख-दुःख के साथी अरुण जेटली के अंतिम दर्शन को विदेश से क्यों नहीं आये

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नई दिल्ली: इस समय अधिकतर देशवासी सिर्फ यही सोच रहे हैं कि अरुण जेटली जैसे बड़े भाजपाई नेता के अंतिम दर्शन के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विदेश से वापस क्यों नहीं आये, उन्हें ना टिकट खरीदने की जरूरत है, ना किराये-भाड़े की चिंता है, पूरी दुनिया में कहीं भी आने-जाने के लिए उन्हें एक मिनट भी सोचने की जरूरत नहीं है, सिर्फ विशेष प्लेन में बैठकर आर्डर देना है, इतनी सुविधा होने के बाद भी नरेन्द्र मोदी ने अरुण जेटली के अंतिम दर्शन को उतना महत्व नहीं दिया जितना महत्व वे G7 समिट को दे रहे हैं जिसका भारत सदस्य भी नहीं है.

बता दें कि अरुण जेटली का निधन 24 अगस्त 2019 को दोपहर 12 बजे के करीब हुआ, उस समय नरेन्द्र मोदी यूनाइटेड अरब अमीरात में थे और वहां पर मोदी का काम करीब करीब ख़त्म भी हो चुका था, अगर मोदी चाहते तो अरुण जेटली के अंतिम दर्शन को UAE से भारत रवाना हो सकते थे, उन्हें भारत पहुँचने में करीब तीन घंटे लगते लेकिन मोदी ने ऐसा नहीं किया.

प्रधानमंत्री मोदी का UAE के बाद बहरीन में कार्यक्रम था, वहां पर उन्हें भारतीय समुदाय को संबोधित करना था, मोदी का कार्यक्रम शाम 8.30 बजे के आस पास था इसलिए मोदी ने अरुण जेटली से ज्यादा बहरीन में कार्यक्रम को तरजीह थी और अपने भाषण में अरुण जेटली को अच्छा दोस्त बताते हुए श्रद्धांजलि दी. लोग हैरान थे, एक तरफ मोदी अरुण जेटली को अपना अच्छा दोस्त बता रहे हैं, दूसरी तरफ उनके अंतिम दर्शन को भी नहीं आ रहे हैं.

अब बात करते हैं बहरीन दौरे की. मोदी का भाषण 9.30 तक ख़त्म हो गया, उसके बाद मोदी चाहते तो भारत आ सकते थे, उन्हें बहरीन से नई दिल्ली पहुँचने में करीब 3 घंटे लगते, दो घंटे नई दिल्ली में खर्च होते और वापस बहरीन पहुँचने में फिर से तीन घंटे लगते, मतलब उनके 8 घंटे खर्च होते लेकिन उन्होंने फिर से अरुण जेटली के अंतिम दर्शन को तरजीह नहीं दी.

मोदी ने क्यों नहीं किये अरुण जेटली के अंतिम दर्शन

मोदी की सबसे बड़ी मजबूरी ये थी कि उन्हें फ़्रांस में G7 समिट में पहुंचना था. गौरतलब है कि भारत G7 का सदस्य भी नहीं है और ना ही बनने की गुंजाइश है. अब आप कहेंगे जब भारत G7 का सदस्य ही नहीं है तो मोदी वहां क्यों गए हैं और समिट छोड़कर अरुण जेटली के अंतिम दर्शन को नहीं आए.

अब हम बताते हैं कि मोदी की सबसे बड़ी मजबूरी क्या थी. सबसे पहले जानिये G7 क्या है. G7 दुनिया के 7 सबसे आधुनिक अर्थव्यवस्ता वाले देशों का समूह है. इसमें – कनाडा, फ़्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, यूनाइटेड किंगडम, यूनाइटेड स्टेट शामिल हैं.

आपको बता दें कि 45वीं बैठक 25 अगस्त को फ़्रांस में हो रही है, इस बैठक को विशेष बनाने के लिए फ़्रांस के राष्ट्रपति इम्मानुएल मैक्रॉन ने भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को विशेष अतिथि के तौर पर न्योता दिया था. इसके साथ ही भारत और फ़्रांस के रिश्तों पर कुछ समझौते होंगे. अगर मोदी बहरीन से भारत आते और अरुण जेटली के अंतिम दर्शन करके फिर से फ़्रांस जाते तो उनके करीब 20 घंटे खर्च होते और तब तक G7 की मीटिंग ख़त्म हो जाती. मोदी को यह न्योता बहुत पहले मिल गया था. उन्होंने फ़्रांस के राष्ट्रपति का न्योता कबूल किया था और आने की हामी भर दी थी. इसीलिए मोदी ने वचन पूरा करने के लिए अपने दोस्त अरुण जेटली के अंतिम दर्शन को तरजीह नहीं दी लेकिन वह अरुण जेटली को याद करके भावुक हो रहे हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि अरुण जेटली से उनका साथ आज का नहीं है बल्कि बहुत पुराना है. अरुण जेटली गुजरात से ही राज्य सभा सांसद चुने जाते रहे हैं. मोदी के सभी फैसलों का वह खुलकर समर्थन करते थे और उनका साथ देते थे, चाहे नोटबंदी हो, GST हो या अन्य कठोर कानून हों, अरुण जेटली ने हर काम में मोदी का साथ दिया.

उम्मीद है कि पाठक लोग मोदी की मजबूरी को समझ गए होंगे और उनके अन्दर उठ रहे सवालों का जवाब मिल गया होगा. मोदी जैसे ही फ़्रांस दौरे से वापस आयेंगे, अरुण जेटली के घर पर जाएंगे और उन्हें श्रद्धांजलि जरूर देंगे.