इब्राहीम क्यों देना चाहते थे बेटे की कुर्बानी, पढ़ें कारण

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नई दिल्ली: बकरीद का त्यौहार आने वाला है, जब भी बकरीद का त्यौहार आता है तो लोग इसे मनाये जाने का कारण भी जानना चाहते हैं. हर किसी के मन में यही ख्याल आता है कि तत्कालीन पैगम्बर इब्राहीम अपने बेटे की कुर्बानी क्यों देना चाहते थे और बाद में मेमने की कुर्बानी क्यों दी गयी.

आपको बता दें कि बकरीद को वलिदान का त्यौहार भी कहा जाता है. इसी वजह से किसी ना किसी जानवर की कुर्बानी देकर त्यौहार मनाया जाता है. यह मुसलमानों का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है, त्यौहार मनाने के लिए काफी पहले से तैयारियां शुरू की जाती हैं.

तो हम बताते हैं कि यह त्यौहार क्यों मनाया जाता है, इसके अलावा बकरीद पर बकरा क्यों काटा जाता है. दरअसल अरब देश में एक इब्राहीम नाम का व्यक्ति रहता था जिसे उस समय पैगम्बर यानी अल्ला का दूत माना जाता था. एक दिन उन्हें ख्वाब आया जिसमें अल्ला ने उनसे कहा कि इस संसार में जो चीज तुम्हें सबसे प्यारी है आप उसे मुझपर कुर्बान कर दीजिये.

ख्वाब टूटने के बाद इब्राहीम ने अपनी सबसे पसंदीदा चीज का ख्याल लिया तो उन्हें लगा कि मुझे तो सबसे प्यारा मेरा बेटा लगता है, मैं इसे ही अल्ला के लिए कुर्बान कर देता हूँ. जब इब्राहीम ने अपने बेटे की कुर्बानी देनी चाहिए तो अल्ला ने उसे एक मेमना दिया और कहा कि बेटे की कुर्बानी करने के बजाय आप मेमने की भी कुर्बानी कर सकते हैं. उसके बाद मुसलमान लोग बकरीद पर भेड़/बकरे या मेमने की कुर्बानी देते हैं.

उसी समय से बकरीद का त्यौहार बनाया जाता है, कुछ लोग बकरे के अलावा अन्य जानवरों की भी कुर्बानी देते हैं. जानवरों को काटने के बाद उनके तीन पार्ट किये जाते हैं. एक भाग गरीबों और जरूरतमंदों को दिया जाता है, दूसरा भाग घर के लिए रख दिया जाता है और तीसरा भाग रिश्तेदारों को दिया जाता है.

तो इस आर्टिकल के जरिये आप लोगों ने जान लिया होगा कि इब्राहीम अपने बेटे की कुर्बानी क्यों देना चाहते थे और बाद में मेमने की कुर्बानी देने की प्रथा क्यों शुरू हुई.