बापू जिंदा होते तो जिस रास्ते पर वो चल चुके थे, लोगों में तेजी से अनपॉपुलर होते: कपिल मिश्रा

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नई दिल्ली, 17 मई: फिल्म अभिनेता और राजनेता कमल हासन ने महात्मा गांधी की ह्त्या करनें वाले नाथूराम गोडसे को हिन्दू आतंकवादी बताया था, उसके बाद बवाल मच गया था, कमल हासन को जवाब देते हुए बीजेपी नेता साध्वी प्रज्ञा ने नाथूराम गोडसे को देशभक्त बता दिया, साध्वी प्रज्ञा के इस बयान को विपक्षियों ने लपक लिया और बीजेपी पर हमलावर होनें लगे.

उसके बाद बीजेपी ने साध्वी प्रज्ञा के बयान से किनारा कर लिया और उन्हें मांगी मांगनें की सलाह दी, उसके बाद साध्वी प्रज्ञा ने तत्काल माफ़ी मांग ली, इस मामलें पर दिल्ली के मुख्यमंत्री कपिल मिश्रा ने एक स्पेशल लेख लिखा है.

पढ़ें कपिल मिश्रा का लेख

कपिल मिश्रा ने लिखा- गोडसे ने अगर बापू को नहीं मारा होता तो शायद बापू को ये देश इतना महान और बड़ा नहीं मानता। बापू के नाम और जो दुकानें और धन्धे चल रहे हैं वो भी नहीं चलते, नकली गांधी बनकर राज करने वाले शायद आज होते ही नहीं कहीं। हत्या ने बापू को महान बना दिया और उन असली मुद्दों को छोटा कर दिया जिनके भावावेश में हत्या हुई।

जीवन के अंतिम दिनों में बापू पाकिस्तान और पाकिस्तानी सोच के आगे समपर्ण करते दिखते हैं , अपने अहिंसा के सिद्धांत को महान बनाने का एक लालच उन्ही आंखों पर पट्टी की तरह बंध गया था, ऐसा लगता हैं।

अगर बापू जिंदा रहते तो देश मे खुलकर इन मुद्दों की चर्चा होती, लेकिन बापू की हत्या के कारण इन मुद्दों पर बोलना ही गुनाह बन गया। हत्या होते ही बापू के बारे में नेगेटिव बोलना अपराध बन गया। बापू जिंदा होते तो जिस रास्ते पर वो चल चुके थे, वो लोगों में तेजी से अनपॉपुलर होते।

जैसे आज गोडसे के विचार या सोच बताने के लिए मुश्किल होती हैं, वैसे गांधी के विचार बताने में मुश्किल होती। लोगों के मन मे गांधी की आंदोलन, अहिंसा, महात्मा की छवि धुंधली हो जाती और पाकिस्तान के प्रति समर्पण, अहिंसा को सही बताने की अंधी जिद्द में कायरता की तरफ झुकना जैसी यादें ही रह जाती। बापू को ना भारत में साथ मिलता ना पाकिस्तान में। शायद उन्हें राष्ट्रपिता भी ना माना जाता।

गोडसे ने बापू की हत्या करके एक तरह की नई लाइफलाइन दे दी बापू के विचारों को…लेकिन हत्या ने वो सभी सवाल दबा दिए लंबे समय के लिए …आज सत्तर साल बाद लोगों के मन में सवाल उठने लगे हैं दुबारा, बंटवारे के समय किसने क्या किया, क्यों किया? शायद सौ साल बाद खुलकर बोलने और कहने भी लगेंगे सब।

गोडसे के बयानों और कोर्ट की कार्यवाही को पढ़कर हर कोई भावुक होता हैं। बिना गांधी की हत्या के अगर वो विचार सामने आते तो विचारों की ताकत कुछ और भी ज्यादा होती। शायद नकली गांधीवादियों का गंदा खेल देश को ना झेलना पड़ता।

आज ऊपर कहीं बापू और गोडसे एक साथ बैठे होंगे, एक दूसरे को जानने समझने का पूरा समय होगा उनके पास। भगवान राम में दोनों की आस्था थी इसलिए दोस्ती भी हो गयी होगी।

क्या सोचते होंगे दोनों – शायद गोडसे सोचते होंगे कि हिंसा ना करता तो ज्यादा अच्छा होता और बापू सोचते होंगे कि देश और धर्म के आत्मसम्मान के लिए कभी कभी अहिंसा छोड़नी भी पड़े तो ठीक हैं। बापू और गोडसे तो एक दूसरे को समझ चुके होंगे लेकिन हम शायद हम ना बापू को समझ पाए और ना गोडसे को.