Oct 22, 2017

गुजरात में वंशवादी और जातिवादी नेता BJP के खिलाफ हुए एकजुट, दिलचस्प हुई चुनावी जंग


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जातिवादी नेता और जातिवादी राजनीति हमारे देश के लिए बहुत खतरनाक है क्योंकि जातिवादी नेता अपनी अपनी जातियों के लोगों को सरकार और सिस्टम के खिलाफ भड़काते हैं, उन्हें बड़े बड़े सपने दिखाते हैं और अपना हित साधते हैं, नतीजा यह होता है कि जातिवादी राजनीति करने वाले लोग बड़े नेता बन जाते हैं लेकिन जनता को कुछ नहीं मिलता, उनका सिस्टम और सरकार के प्रति अविश्वास बढ़ता जाता है, उनके मन में क्रोध और गुस्सा भर जाता है.

अब गुजरात में एक बार फिर से जातिवादी पॉलिटिक्स शुरू हो गयी है, जातिवादी और वंशवादी नेता बीजेपी के खिलाफ एकजुट हो गए हैं, एक तरफ बीजेपी विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ना चाहती है लेकिन दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी जातिवादी नेताओं को बड़े बड़े लालच देकर उन्हें कांग्रेस से जोड़ रही है ताकि इनकी जाति के लोग उन्हें वोट देकर गुजरात में कांग्रेस की सरकार बना दें.

जातिवाद की राजनीति बहुत गन्दी होती है, यह ना सिर्फ समाज में एक दूसरे को लड़ाती है, आपसी प्रेम, भाईचारा और सद्भाव ख़त्म करती हैं, जनता को अँधा भी कर देती है, लोग अच्छा बुरा देखना छोड़ देते हैं और सिर्फ अपनी जाति देखना शुरू कर देते हैं, इसके बाद वे अंधे होकर अपनी जाति वाले नेताओं के कहने पर वोट देते हैं और पांच साल पछताते हैं.

अब गुजरात में जातिवादी राजनीति शुरू हो गयी है क्योंकि जातिवादी नेता अल्पेश काकोर (OBC), जिग्नेश मेवानी (दलित) और हार्दिक पटेल (पटेल) ने कांग्रेस को समर्थन देने का फैसला किया है, मुस्लिम वोट पहले से कांग्रेस के साथ हैं.

अब कांग्रेस गुजरात के मुस्लिमों, OBC, दलितों और पटेलों को अपने साथ मिलाकर गुजरात से मोदी के अस्तित्व को ख़त्म करना चाहती है, इन नेताओं ने भी मोदी को उखाड़ने की कसम खा ली है, अब देखना है कि बीजेपी वाले जातिवाद की राजनीति करने वालों से निपट पाते हैं या हार का मुंह देखते हैं क्योंकि जातिवाद की राजनीति बड़ी अंधी होती है, लोग आँखों से देखना छोड़ देते हैं और जाति की नजरों से देखना शुरू कर देते हैं. 

खैर बीजेपी को डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह राजनीति पहले भी हो चुकी है और विरोधियों ने मुंह की खाई है क्योंकि गुजरात के लोग सोच विचारकर, अच्छा बुरा तय करके वोट देते हैं, उन्हें पता है कि मोदी से अगर गुजरत का रिश्ता ख़त्म करेंगे तो उन्हें नुकसान होगा, क्योंकि उन्हें केंद्र से मदद नहीं मिल पाएगी.
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