Jun 17, 2017

PWD में पकड़ा गया केजरीवाल सरकार का करोड़ों रुपये का घोटाला, झूठा काम दिखाकर बनाते हैं फर्जी बिल


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New Delhi, 17 June: दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और उनके मंत्री सत्येन्द्र जैन पर करोड़ों रुपये के घोटाले के आरोप लग रहे हैं, अब तक केजरीवाल बचने के लिए पूरे हाथ पाँव चला रहे हैं लेकिन अब उनके घोटालों के सबूत भी मिलने लगे हैं, आज उनके खिलाफ आज तक न्यूज़ ने सबूत जारी किये हैं जिसके अनुसार केजरीवाल सरकार का PWD विभाग बिना काम किये ही करोड़ों रुपये का फर्जी बिल बना देता है और सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये पेमेंट कर दिए जाते हैं.

रिपोर्ट के अनुसार सत्येन्द्र जैन के कंट्रोल में आने वाले PWD विभाग ने दिल्ली में सड़क और नालों के ठेके की आड़ में सरकारी खजाने की खुली लूट की है, कई मामलों में फर्जी बिल के आधार पर सरकारी खजाने से करोड़ों के पेमेंट दिए गए हैं और कई मामलों में बिना बिल के ही ठेकेदारों को करोड़ों रुपये के पेमेंट जारी कर दिए गए हैं. यह एक दो जगह नहीं बल्कि पूरी दिल्ली में हुआ है, केजरीवाल और उनके PWD मंत्री सत्येन्द्र जैन की देख रेख में लूट का यह खेल चल रहा है.

केजरीवाल सरकार ने पेमेंट करने से पहले यह भी नहीं देखा कि काम कहाँ पर किया जा रहा है, जिस नाले को ठीक करने के लिए करोड़ों रुपये दिए जा रहे हैं वह नाला है भी या नहीं, जिस सड़क के लिए करोड़ों रूपए दिए जा रहे हैं उस सड़क पर कुछ काम हुआ भी है या नहीं. कई इलाकों में ठेकेदारों को फर्जी बिलों के आधार पर करोड़ों रुपये दिए गए हैं. जब इन कामों की पड़ताल की गयी तो पता चला कि कहीं पर काम हुआ ही नहीं है.

'आजतक' के पास मौजूद दस्तावेज बताते हैं कि कैसे साल 2014-15 में सत्येंद्र जैन के मंत्री रहते हुये दिल्ली की तमाम सड़कों और नालों की मरम्मत और सफाई का काम कानून को ताक पर रखकर कई ऐसे ठेकेदारों को दिया जिनके भुगतान का रिकॉर्ड ना तो पीडब्ल्यूडी विभाग के पास है ना ही सरकार के सेल्स टैक्स विभाग के पास और ना ही खुद ठेकेदार के पास. दिल्ली सरकार के पीडब्ल्यूडी विभाग ने कैसे बगैर बिलों और नियम कायदे के सरकारी ठेकों को पास कर दिया इसका खुलासा हुआ है निर्माण विभाग के आरटीआई जवाब से.

दरअसल, दिल्ली सरकार के अंतर्गत आने वाली सडकों और नालों के निर्माण और मरम्मत का जिम्मा दिल्ली सरकार के पीडब्ल्यूडी विभाग के पास होता है. जिसके लिये ठेकेदारों को तय नियमों के तहत काम करने को कहा जाता है और काम पूरा होने के बाद जांच और बिलों के आधार पर पूरा भुगतान किया जाता है. लेकिन, अधिकारियों ने ठेकेदारों के साथ मिलकर ऐसा गोरखधंधा शुरू किया कि बगैर बिलों के ही पूरा भुगतान कर दिया गया. जब आरटीआई के तहत जवाब मांगा गया तो जवाब मिला कि हमारे पास भुगतान किेये बिल्स का कोई रिकॉर्ड है ही नहीं.

इस गोरखधंधे से दिल्ली में एक-दो नहीं बल्कि सैकड़ों जगह पर घोटाला किया गया और सरकारी खजानों को करीब 200 करोड़ का चूना लगाया गया. जानकारी के मुताबिक पीडब्ल्यूडी विभाग के इंजीनियर्स ने अपनी साजिश को अंजाम देने के लिये दिल्ली की उन-उन जगहों पर मरम्मत और रख-रखाव का काम ठेके पर दिया जहां या तो इसका जरूरत ही नहीं थी या फिर उन जगहों को देखकर पहचान करना मुश्किल था कि आखिर कोई निर्माण कार्य हुआ है या फिर नहीं.

'आजतक' के पास मौजूद दिल्ली सरकार के उन कामों की फेहरिश्त है जिसे देखकर साफ पता चला है कि जिन जगहों पर काम कराया गया दिखाया गया है वो दरअसल बेहद संदेहास्पद है और जिन्हें देखकर कहना मुश्किल है कि काम हुआ क्या है. इससे भी ज्यादा हैरानी की बात ये है कि दिल्ली सरकार ने जिन ठेकेदारों को काम कराने का जिम्मा दिया उन्होंने ठेके पाने के लिये तय खर्च से 60 से 70 प्रतिशत कम तक में काम कराने का दावा ठोंक दिया यानि कि जिस काम के लिये क्वालिटी के नियमों के मुताबिक सरकार के पास 100 रुपये का बजट था उसे ठेकेदारों ने 30-40 रुपयों मे ही करने की हामी भर दी, जो कि संभव ही नहीं था.

मकसद साफ है, तय कीमत से आधे से भी कम लागत में काम कराने का ठेका लेने के पीछे आशंका है कि ये सारे काम वास्तव में किये ही नहीं गये और ना ही इसके लिये कोई सामान की कंस्ट्रक्शन मैटेरियेल की खरीद-फरोख्त की गयी और बिना बिलों के सरकार ने भी ठेकेदारों को भुगतान कर दिया. आइए अब डालते हैं कुछ ऐसे ही कामों पर... 

केस- 1
जगह- इगनू रोड, पुराना मेहरौली बदरपुर रोड, फिरनी रोड
काम- नाले को सुधारने और आरएमसी निर्माण कार्य 
खर्चा- 3,26,26,450 रुपये
ठेका- वरुण गुप्ता एंड कंपनी
कॉन्ट्रेक्टर- वरुण गुप्ता

सन 2014-15 में दिल्ली के इगनू रोड, पुराना मेहरौली रोड और फिरनी रोड के नालों की मरम्मत और निर्माण कार्य के लिये ठेका दिया गया. आरोपों के मुताबिक इन जगहों पर कोई कार्य ही नहीं हुआ. आरटीआई में जब इन जगहों पर हुये काम के भुगतान, रसीदों और रिकॉर्ड्स के बारे में जानकारी मांगी गयी तो जवाब मिला वो हैरान करने वाला था. पीडब्ल्यूडी ने जवाब दिया- हमने ऐसा कोई रिकॉर्ड नही रखा है क्योंकि करार के मुताबिक ऐसा कोई रिकार्ड रखना जरूरी नहीं है.

जब 'आजतक' की टीम ने इन जगहों पर जा कर देखा तो पता चला कि मेहरौली रोड पर तो कोई ओपन नाला ही नहीं है. उसके बाद टीम मेहरौली के पास की ही एक और साइट पर देखने पहुंची. इस रोड पर मरम्मत और नाले के रखरखाव का काम किया गया था लेकिन इगनू रोड के नाले की मरम्मत और निर्माण की असलियत कुछ और ही थी.

इसके बाद 'आजतक' की टीम ने इस काम को कराने वाली कंपनी की तरफ रुख किया. साकेत में बनी वरुण गुप्ता एंड कंपनी का दफ्तर रिहायशी इलाके में है. दफ्तर में नाम मात्र का स्टॉफ. हमने जब इनसे सवाल किये तो दस तरीके के बहाने बताए गए. लेकिन इस बात का कोई जवाब नहीं दिया गया कि आखिर वो रिकॉर्ड्स कहां हैं जिनके आधार पर सरकार से लगभग 3 करोड़ रुपये का पेंमेट मिला. खैर रिकॉर्ड नहीं मिलना था और बहाने तमाम थे. लेकिन, आरटीआई में पीडब्ल्यूडी विभाग के जवाब ने पहले ही साफ कर दिया कि जिस काम के लिये करोड़ों का भुगतान किया गया उसका कोई रिकॉर्ड ही नहीं है.

सन 2014 में दोबारा सत्ता में आने के बाद आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की सड़कों और नालों को दुरुस्त करने का बीड़ा उठाया था और इसके लिये जिम्मेदार विभाग के मुखिया थे आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और मंत्री सत्येंद्र जैन. वही सत्येंद्र जैन जिनकी मनमानी और कानून को ताक पर रखने के मामले एक-एक कर बाहर आ रहे हैं. सबूतों के मुताबिक सत्येंद्र जैन के विभाग के इंजीनियर और ठेकेदारों ने मिलकर दिल्ली की करीब 200 सड़कों और नालों की मरम्मत का जिम्मा लिया जिनमें से ज्यादातर जगहें और काम की डिटेल ऐसी है जिसे पहचान पाना भी मुश्किल है. दस्तावेजों पर काम की डिटेल कुछ इस तरह से लिखी हैं कि जिसे वास्तव में ढूंढना मुमकिन ही नहीं है.

सत्येंद्र जैन के लोक निर्माण विभाग ने दिल्ली के हर कोने में सीवर और सड़क ठीक करने का जिम्मा अलग-अलग कॉन्ट्रेक्टर को दिया लेकिन कमाल की बात है कि हर जगह काम के नाम पर सिर्फ घोटाला ही किया गया. ऐसा हम नहीं बल्कि पीडब्ल्यूडी विभाग के कागजात खुद इशारा कर रहे हैं. 

केस- 2
जगह- दिल्ली का कालका जी, रामपुरा मेन रोड और प्रताप नगर रोड
काम- सीवर के सुधार और फुटपाथ बनाने का
खर्चा- 3,88,19,934 रुपये
ठेका- न्यू भारत कंसट्रक्शन कंपनी
कॉन्ट्रेक्टर- मुख्तार अहमद

जब इन जगहों पर काम करने की जांच की गई तो कहीं भी इसकी तस्दीक नहीं हो पायी. कोई नामोनिशान ऐसा नहीं मिला जिससे पता चले कि सीवर के सुधार और निर्माण का कोई काम इन जगहों पर किया गया है. यानि मतलब साफ था यहां भी काम सिर्फ कागजों पर ही किया गया था. लिहाजा आजतक की टीम ने कागजों को जांचना ठीक समझा. दिल्ली की एनजीओ रॉको यानि कि 'रोड एंटी करप्शन ऑर्गेनाइजेशन' की आरटीआई के जवाब में दिये गये सबूतों के मुताबिक पीडब्ल्यूडी विभाग जमा किये  कागजातों के हिसाब से ठेका लेने वाली न्यू भारत कंसट्रक्शन कंपनी ने काम करने के लिये जिन जगहों से सामान खरीदा वो थे विनायक सेल्स और कार्तिक ट्रेडिंग जो कि दोनों ही दिल्ली की कंपनियां हैं.

मुख्तार अहमद की कंपनी न्यू भारत कंसट्रक्शन के मुताबिक निर्माण और मरम्मत करने के लिये जो सामान खरीदा वो इन्हीं जगहों से खरीदा. जिनके बिल बकायदा पीडब्ल्यूडी विभाग में जमा किये गये. लेकिन जब इन मैटेरियल सप्लायर्स से पूछा गया तो विनायक सेल्स ने बताया कि उन्होंने कभी कोई भी बिजनेस डीलिंग न्यू भारत कंपनी से की ही नहीं. उन्होंने इस बात का बकायादा लिखित दस्तावेज भी दिया. इसके अलावा यह बात भी सामने आई कि कार्तिक ट्रेडिंग कंपनी नाम की कोई कंपनी है ही नहीं. इस बात की तस्दीक सेल्स टैक्स विभाग ने लिखित रूप से की.

बावजूद इसके पीडब्ल्यूडी विभाग ने इस काम का पूरा भुगतान यानि करीब 4 करोड़ रुपये बगैर किसी जांच के दे दिया. वजह साफ थी सीवर और निर्माण के लिये जिस काम के लिये विभाग करोड़ों रूपये लुटा रहा था वो काम दरअसल हुआ ही नहीं था. 
अगर आरटीआई के जवाब में पीडब्ल्यूडी विभाग की दलीलों और जवाबों की बात करें तो हर ठेके मे सिर्फ कागजी किले बनाये गये हैं. दिल्ली के सीवर और निर्माण के काम में सारे नियमों को ताक पर रख कर ना सिर्फ ठेके दिये गये बल्कि पेमेंट करने में तो कानून की धज्जियां उड़ाने की हदें पार कर दी गयी.

करीब आधा दर्जन कामों में आरटीआई के जवाब और हमारी जांच में पाया गया कि या तो कोई काम हुआ ही नहीं और फर्जी बिल पर भुगतान लिया गया है या फिर अगर कहीं काम किया गया है तो इतने घटिया दर्जे का जिसके एवज में भुगतान पीडब्ल्यूडी विभाग की मिलीभगत की ओर साफ इशारा करता है.

केस- 3
जगह- दिल्ली का ब्रिटेनिया चौक इलाका
काम- गुरू हरिकिशन मार्ग के पास ब्रिटेनिया चौक की रोड नंबर 43 की मरम्मत
खर्चा- 15,32,11,811 रुपये
ठेका- एमआईए कंसट्रक्शन कंपनी
कॉन्ट्रेक्टर- मोहम्मद इकबाल

आरटीआई के जवाब से तो साफ था कि यहां भी बिलों के फर्जीवाड़े से करोड़ों की रकम पीडब्ल्यूडी के भ्रष्ट अधिकारियों और कांन्ट्रेक्टर के बीच डकारी जा चुकी है. लेकिन, आज तक की टीम ने इलाके का खुद भी जायजा लेने की सोची. नतीजा ये मिला कि इस जगह पर कोई काम हुआ ही नहीं. यही हाल दिल्ली के अशोक विहार के फेज थ्री इलाके के फुटपाथ और ड्रेन के ठेके के भुगतान का निकला.

सन 2014-15 में करीब 8 करोड़ रुपये का ठेका दिल्ली की एमसी कंस्ट्रक्शन कंपनी को दिया गया जिसमें मलिक इस्सार मार्ग पर काम किया जाना था. लेकिन, हुआ कुछ भी नहीं. अब इस पर भी पीडब्ल्यू विभाग के अधिकारियों की मेहरबानी देखिये कि बगैर कायदे-कानून की परवाह किये लगभग 8 करोड़ रुपयों का पेमेंट तो करवा दिया लेकिन जब आरटीआई के जरिये बिल और रिकॉर्ड्स का जवाब मांगा गया तो जवाब मिला कि पेमेंट के बाद बिल और रसीद का रखा जाना जरूरी नहीं है.

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